March 5, 2012

बस जिद्द में चलते जा रहे हैं ..



किसको मालूम है ग़म के कितने और बादल बाकी है ..
हम बरसे तो बस बरसते जा रहे हैं

कौन जानता है जन्नत के निशाँ कहाँ मिलते हैं ..
हम तरसे यूँ की बस तरसते जा रहे हैं

ज़िन्दगी के सूखे सफ़ेद पत्तों पर ..
हम रिश्तों के लहू से लिखते जा रहे हैं

मकान अपना कहते थे जिस दिल को कभी ..
उन दीवारों की हद्द से बाहर निकलते जा रहे हैं

एक बे-लौस सी नज़र हमको कुबूल हुई थी कभी ..
हम उन नज़रों से बच कर छुपते जा रहे हैं

वो जो महसूस होता था तो महसूस ही नहीं होता था ..
अब उसके एहसासों के क़र्ज़ से बिदकते जा रहे हैं

कहानियों के लालच दे कर रोक लिया करता था बरगद का पेड़ ..
पर हम मुसाफिर हैं तो बस एक जिद्द में चलते जा रहे हैं

मोम की गुडिया बन के सदियों तक उम्र गुजारी है ..
अपनी ही आह में अब पिघलते जा रहे हैं

यूँ मेहरबान थी, पर काम न आई मसीही मेरी ..
फिरदौस की गलियों में भी भटकते जा रहे हैं

March 3, 2012

आखों से अब बरसात नहीं होती ..



आज आईने में सामने बिठा के बोल दिया ज़िन्दगी से ..
कद्र कर मेरी! ना मैं होती तो तू भी नहीं होती


दिन बा दिन, दिनों की आवारगी बढ़ती जाती है ..
हम बिखर जाते जो रातों को रात नहीं होती

सस्ते दामों पर मैंने खरीद लिए कुछ कदमो के निशाँ ..
सफ़र में बिछा लूं इन्हें ज़रा, आज तन्हा तन्हा बात नहीं होती

मंजिलों की भी उड़ान है, अभी और ख्वैशें हैं ..
यहाँ पहुँचने पर भी मंजिल मेरे साथ नहीं होती

हम भी जुट जाते हर जीत हासिल करने यारों ..
काश सामने हमारे ना-कामियों की कायनात नहीं होती 

शायद मेरे दुश्मनों से जा के मिल आई है ये ..
मेरी हो के रहती तो ज़िन्दगी बर्बाद नहीं होती  

कुछ सवालों का धुंआ आँखों में बस चला है ..
जवाब होते हैं, पर आखों से अब बरसात नहीं होती 

लम्हे सिकुड़ के मर जातें है मेरे ठन्डे एहसासों पे ..
मेरी कलम में यूँ ही शब्दों की खैरात नहीं होती 

February 23, 2012

मेरा कुछ सामान ...



मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है ..
हो सके तो उसे अपने पास ही रख लेना

एक घूंघट की शर्म जो शायद दरवाज़े के पीछे टंगी है ..
उसे बिस्तर के एक किनारे पर रख देना

एक पायल यहीं कहीं गुम गयी थी चलते चलते ..
मिले तो अपने क़दमों के पास पास रख लेना

मेरे माथे का चाँद, अलसाया से मेज पे ऊँघता होगा ..
उसे .. सुनो ..
उसे तुम अपनी दिल के आसमान पे टांग लेना 

कुछ खुले हुए सिरे है मेरे उलटे सीधे सवालों के ..
उन्हें अपनी अनकही के धागों में बाँध लेना

एक पिघला सा ख्वाब होगा कांच की कटोरी में ..
उसे अपने आईने में कही पलक पलक छुपा लेना

कुछ सितारे जो उंगलियों से छुए तो जुगनू बन गए ..
उन्हें छत पे जा कर हवाओं पे सजा देना 

एक बारिश होगी खिडकी पे भीगने को डाली थी ..
ठण्ड न लग जाए कहीं, 
तुम बारिश उतार कर, मेरा पीला वाला दुपट्टा ओढा देना 

दराज़ मैं एक खत होगा, प्यासे लफ्जों में सूखता हुआ ..
उसे अपनी गीली मुस्कान से एक बार फिर सींच देना

एक चाय का कप जो बिस्तर की साइड नीचे पड़ा मिलेगा ..
उस पर से मेरे होठों के निशाँ उतार के अलमारी में रख देना

वो सुनहरी शाम जो मेरी बालियों में अटकी पड़ी है ..
उसकी कशिश, संभाल के उतारना.. यूँ कमरे में बिखरने मत देना

एक गुल्लक जिसमे हमारी बातों की अशर्फिया डाला करती थी ..
मैं नहीं हूँ तो भी तुम उसे भरते रहना

तकिये के नीचे हर रात एक मुस्कान छुपाया करती थी ..
अब भी हंस रही होंगी, तुम उन्हें अपने होठो पे रख लेना

वो करवटों की जन्नत, जहाँ हम तुम मिला करते थे ..
तुम्हे मिल जाए, तो उसे वापिस अपनी दुआओं में रख लेना 

February 22, 2012

कल रात फिर ..




सूरज टूट टूट के गिरने लगा है समंदर में ..
मैंने कल रात फिर चाँद डुबोया था यहाँ

यादों की लहरें साहिल पे बिखरने लगीं हैं ..
हिज्र के मोतियों को कभी संजोया था यहाँ

एक शाम के आधे पौने वादे पे पूरा दिन निसार किया ..
पानी के शीशे में अपना अक्स छुपाया था यहाँ

रोज़ सिमट आती हैं हसरतें अपने आप में ..
एक बहती रात में एक लम्बा सा दिन पिरोया था यहाँ

पिछली पतझड़ में गिरे, सूखे पत्तों में भी नमी सी है ..
इन्हें एक बार भीगा बादल दिखाया था यहाँ

ऐ दिल ..



तुमने कहाँ से बेसबब कहानियाँ लिखना सीखा ..
कहाँ से सवालों की जवाबदारियाँ लिखना सीखा

खुद ही धड़कते हो दर्द बन के सीने में ..
कहाँ से हरे ज़ख्मों सा रिसना सीखा

तुम को दूर रखा था इश्क और किस्मत के दो पाटों से ..
तुमने कहाँ से रोज़ रोज़ ज़िन्दगी में पिसना सीखा

तुम्हे हर खरीदार के तोल मोल से बचाया मैंने ..
तुमने कहाँ से खुद बाज़ार जा कर बिकना सीखा

किसने दी तुम्हे इजाज़त मोहब्बत में पागल हो जाने की ..
तुमने कहाँ से प्यार करना इतना सीखा

एक चादर सी फैली हैं अब दिन के उजालों पर ..
तुमने कहाँ से रौशनी पर मर मिटना सीखा

दर्द पराये ले कर खुद को परेशान करने लगे ..
तुमने कहाँ से खुद में उलझना सीखा

एक उम्र गुजरी है तुम में, ज़िन्दगी बूढी हुई है ..
तुमने कहाँ से फिर से बच्चे सा बिलखना सीखा

अभी को कितने इम्तिहाँ बाकी है मजबूरियों के ..
तुम ने कहाँ से मुश्किलों से बिदकना सीखा

ये मेले हैं, भीड़ है सौदागरों की ..
तुम ने कहाँ से अकेले में तड़पना सीखा

अभी तो खुद से खुद की मुलाक़ात बाकी है ..
तुमने कहाँ से क़तरा क़तरा बिछड़ना सीखा

एक मुसाफिर था तू भी, रास्तों पे क़दमों के निशाँ कहते है ..
तुम ने कहाँ से बे वजह रुकना ठिठकना सीखा

मुलायम ही होती रातें तो कौन नींद से शिकायत करता ..
तुमने कहाँ से चाँद से लड़ना सीखा

फासलों से ज़िन्दगी में कुछ पल इनायतें हैं ..
तुम ने कहाँ से इस दरमियान मरना सीखा

वक़्त की शाखों से रात टपकती है दिन भर ..
तुम ने कहाँ से रातों को दिन करना सीखा

February 13, 2012

ये दौलत की सल्तनत



ये दौलत की सल्तनत तुम्हे मुबारक हो, ऐ दोस्त /
मैंने रास्ते में फ़कीर को हँसते हुए देखा

तुमने खूब जीते होंगे दुश्मनों के घर /
मैंने तुम्हारे घर एक बच्चे को बिलखते देखा

तुम्हारे शोहरत की किस्से में रोज़ इजाफा हुआ करे /
मैंने तुम्हारे दोस्त को तुमसे बिछड़ते देखा

तुम महफ़िल की जान हो और हर दिल अज़ीज़ हो
मैंने वीरानियों में तुम्हे रोते देखा

तुमने हाथों में जकड ली सारी दुनिया /
मैंने तुम्हारे हाथों से वक़्त फिसलते देखा

तुम सूरज की तरह निकलते हो तो ढल भी जाओगे एक दिन
चाँद मुसाफिर है, मैंने इसे सिर्फ चलते देखा

तुम रहा किये गुमान में की ज़िन्दगी तुम्हारी है /
मैंने अंधेरों में रौशनी को भी रंग बदलते देखा

तुम ने ज़मीन पर लिख दिया नाम, अब ज़मीन तुम्हारी है /
मैंने बेनाम आसमान को भी दिन रात बरसते देखा

एक ठंडी लाश सीने से चिपकाए चलते हो /
मैंने तुम में एक जिस्म सुलगते देखा

मेरे हर सवाल के जवाब में एक और सवाल करते हो /
मैंने तुम्हे तुम्हारे ही जवाबों में उलझते देखा

यूँ कहने को तुम्हारे पास लफ़्ज़ों की कमी तो नहीं /
मैंने तुम में खामोशियों को टहलते देखा

एक दर्पण में तुमने खुद को मुस्कुरा के देखा होगा /
मैंने उस दर्पण को तुम से आँख चुराते देखा

तुम खुश हो की तुम मंजिल की गोद में हो /
मैंने तुम्हारे क़दमों में एक और सफ़र मचलते देखा

साहिबान, मेरे अल्फाजों पे गौर न करो /
मैंने खुद को भी राख राख बिखरते देखा

February 11, 2012

शायद मैं बोला करती थी ..


ठीक से याद नहीं पर शायद मैं बोला करती थी 
दोस्त बुलाते तो उनसे हंस के बोला करती थी 
कुछ ग़लत होता, तो वकीलों की तरह बोला करती थी 
मैं बोला करती थी 

कभी नज़्म सी उभरी कभी ग़ज़ल सी गुनगुनाया करती थी 
कभी दुआ बन के अपने ही लबों पे आ जाया करती थी
कभी सजदा बन के याद तुझे, मेरे मौला, करती थी 
मैं बोला करती थी

महफ़िल-ए-तन्हाई को अनगिनत कहानियों से संजोया करती थी 
कल और कल के धागों में बेवजह खुद को पिरोया करती थी 
जाने कितने तारों से राज़ सभी खोला करती थी 
मैं बोला करती थी 

वक़्त की लय पर खुद को नचाया करती थी 
कितने चाँद ज़ाया कर के सूरज के क़र्ज़ चुकाया करती थी 
रात के पैमाने में दिन के ज़ख्म घोला करती थी 
मैं बोला करती थी 

ज़िन्दगी की परतों को खुद से कुरेद कुरेद के उतारा करती थी 
गीले काजल की स्याही से कागज़ पे दर्द संवारा करती थी 
अधूरे जिस्म और आधी पौनी साँसों के रिश्ते तौला करती थी 
मैं बोला करती थी 

कुछ सदियाँ पहले की बात हो मानो, ज़माने यूँ बीत जाते है 
गले में आ आ कर एहसास  खुद-ब-खुद रुंध जाते हैं 
शब्द भीगते थे पर होठों पे हर शबनम शोला लगती थी 
ठीक से याद नहीं पर शायद मैं बोला करती थी 

February 9, 2012

ज़िन्दगी की हर उस शाम ..



जहाँ एक बूढा दिन, एक रात के बचपन से मिला करता है
दिखता नहीं पर उम्मीद का एक नन्हा सा चाँद  उग आता है
जब आसमान का रंग गहरा होते होते .. कुछ पल को ठहर जाता है
    ज़िन्दगी की हर उस शाम में तुम याद आते हो ..

जब जीने से रौशनी की परियां उठ के जाने लगती हैं
जब झूले पर बैठ के एक किताब खुद को पढ़ने लगती है
जब बिन बारिश भी मिटटी से सौंधी महक आने लगती है
    ज़िन्दगी की हर उस शाम में तुम याद आते हो ..

जब आहट भर से निगाहें अधखुले दरवाज़े से टकराने लगें
जब गुलाबों में भी रंग तुम्हारा आने लगे
जब चाय के कप पे तुम्हारे होठों के निशान दिखने लगे
    ज़िन्दगी की हर उस शाम में तुम याद आते हो ..

जब छत से दिन भर सूखते ख्वाब उतार लाने का समय हो
जब आसमान में सिर्फ एक तारा और अकेला चाँद हो
जब ना दिन से कोई शिकायत हो ना रात को बुलाने की जल्दी हो
    ज़िन्दगी की हर उस शाम में तुम याद आते हो ..

बड़ी बेपरवाही से खुद की पहरेदारी करती हूँ
पर तुम्हारी यादों से हर शाम वफादारी करती हूँ
कभी सोचती सोचती खुद से पूछा भी करती हूँ
    की तुम क्यूँ नहीं आते जब हर शाम तुम याद आते हो ..

February 3, 2012

कुछ अजनबी हुआ है मुझ में



आज फिर टूटे है दिल के आइने तमाम,
आज फिर कुछ अजनबी हुआ है मुझ में !

आज फिर मिट गए मेरी किताब के लफ्ज़ सभी ,
आज फिर कुछ पानी हुआ है मुझ मे !

आज फिर बारिश में भीगता नहीं ये मन ,
आज फिर कुछ बेमानी हुआ है मुझ में !

आज फिर रिवाजों से लड़ कर आई हूँ मैं ,
आज फिर कुछ खानदानी हुआ है मुझ में !

आज फिर खुद को धोखे से मनाया है,
आज फिर कुछ बेईमानी हुआ है मुझ में !

आज फिर लफ्जों को वक्त के पालने में रख आई,
आज फिर कुछ गुमनामी हुआ है मुझ में !

आज फिर बेतरतीब ख्वाब आखों से निचोड़े हैं,
आज फिर कुछ अधूरी कहानी सा हुआ है मुझ में !

आज खुद को जिंदगी से दौड लगाते देखा ,
आज फिर कुछ मेरा ही सानी हुआ है मुझ में !

आज फिर तय है की आंखों से नहीं बहने दूंगी आँसू,
आज फिर कोई जिद्द ठानी हुई है मुझे में !

आज फिर कतरा कतरा तन्हाई पी ली हमने,
आज फिर कुछ खाली हुआ है मुझ में !

January 27, 2012

रात का यह मौन पहर



रात का यह मौन पहर
ज़िन्दगी को ज़रा सोचा
मानो कुछ थम गया हो सीने में
एक सांस अटकी
तो एक सांस नाराज़ ..

एक खलिश ज़ेहन में रेंगती है
गले में समंदर की प्यास
कहीं दूर से मुझे
सुनाई देती है
मेरी अपनी ही मूक आवाज़ ..

कुछ सपने सामने मेज़ पे
statue* के खेल में 
जड़  पड़े हैं
वक़्त की उँगलियों से धूल में
उभर आये
कुछ एक चेहरों के आकार ..

अपने हाथ की लकीरों में
देखती हूँ कुछ नाम
जो दिखते है वो छूते नहीं
जो छूते है वो दिखते नहीं
ये नाम, कितने बदमाश

ये चाँद जलाता है कागज़ी दिन मेरे
ये धुआं धुआं मेरे ख्वाब
मेरे हाथों पे छिल आते हैं
ऐ ज़िन्दगी,
तेरी चुभन के एहसास ..

मेरे हाथों पे रोज़ लगती है
मेहँदी विस्ल ए यार की
पैरों में मगर ये पायल
इसकी घुंगरू सी गुंजन
और बेड़ियों से अंदाज़ ..

रात के पहलू में सिमटा
मासूम नन्हा सा लम्हा
इस खामोशी के आलिंगन में
ये रात छुपाये कितने सर्द
कितने गहरे काले राज़ ..

January 15, 2012

ये खामोशी सुन रहे हो?



ये खामोशी सुन रहे हो?
ये पानी सी बहती खामोशी ..
काली रात में शांत झील सी खामोशी

आकाश से हसरतों का एक सितारा
इस झील में क्या गिरा
ख़ामोशी .. नूर ऐ खुदा हो गयी
काली रात और नीचे पानी में बहता पिघलता आफ़ताब

मैं पेड़ की डाल सी
बहती नूरानी को छूती हूँ
देखती हूँ
न उदास न उमंगी,
बस देखती हूँ

मेरे कुछ बदमाश पत्ते
कूद गए फिर पानी में
समझाया था इन्हें ..
देखो .. बह गए न मुझसे दूर

इस खामोशी में देखो वक़्त कैसे बह रहा है ठाट से
नहीं देखता वो पेड़ों को, हम तो यूँही बुत बने खड़े है ..
ताकती आखें लिए

कुछ समय पहले की ही तो बात है
मैं भी हरी थी, 
मुझ पर भी चांदी की बौर हुआ करती थी

मुझे में अब भी कोई गुंजन बाकी हो कहीं
जब किरणों की छोटी छोटी परियां आकर झूला डाला करती ..
उनकी कुछ सुनहरी किलकारियां चुरा के रख ली थी
यहीं कहीं एक टहनी पे

ऊपर की पत्तियों को मत देखना
उनपे कुछ धागे रख छोड़े है सूखने को
मासूम परियां जाने कितनी मन्नतें मिन्नतें
बाँध जाती थी मेरे इर्द गिर्द

सोहनी मुझ पर अपना दुपट्टा छोड़ गयी थी
बोला था उसको मटका कच्चा है .. नहीं मानी
डूब गयी वो इसी खामोशी में .. महिवाल के लिए

हीर उसी हरे दुपट्टे को मुझसे खींच ले गयी
नादान थी .. नहीं जानती थी ये तो इश्क की चुनरी है
खुद बा खुद बसंती रंग जाती है
जैसे हीर रांझे में रांझा रंग जाती है

वो दुपट्टा हीर ने झील में धोने को क्या डाला
खामोश झील यूँ बसंती हुई है कि 
रंगरेज़ भी हैरान है
वक़्त का कतरा कतरा भी जल गया इस बसंती आग में
मैं पेड़ की डाल सी .. हैरान हूँ परेशान हूँ
ये नज़ारा भी अभी बाकी था ?
सोचती हूँ ..

मेरे पत्तों पे रखीं वो परियों की सब मन्नतें
आज कुबूल हो जायेंगी
सब पत्ते गिर रहे हैं पानी में
आज सब धागे रंग जायेंगे ..

और मैं ..
बहुत दिनों बाद आज मुझ पर फिर आके कोयल बैठी है
हम दोनों मिल के .. परियों को आवाज़ देने लगती है
आओ.. फिर झूले डालो ना ..

December 30, 2011

Eh hasrat dilon tal di hi nahi ..



kaash assi doven ikko skool che padhe hunde 
maaf karin par ek duje de sab to karibi dost hunde

KG to leke panjvi tak te assi hello vi nahi kehnde
dono apne apne dostaan vich mashroof rehnde
ek din tussi loki saadi gali vich move* ho jaande
assi dono bus stop te milde ek hi bas vich skool jaande
ankh vi na milaande

sixth class vich mainu tu jaan boojh ke rulaunda
volleyball match te tu mainu adangi maar giraaunda
pher sorry kehn de bhaane aunty nu leke ghar aaunda
naale chacha chaudhry te saabu di comics vi liaaunda

ek din main savere late ho jaandi te bhajji bhajji aandi
tu mere liye bus rukwai hoyi si, eh dekh ke khush ho jaandi
saadi dosti ho jaandi

seventh class che tu mera lunch bin mange khaanda
main shikayat kardi te tu mainu ek zoron laganda
phir mere gharon tere layi ek extra lunch box aanda
tu oh lunch box chhad ke mere hi lunch box ton khaanda

eighth class wich tu te main, class de monitor ban jaande
aapas di galan te mukdi nahi si, baaki sab nu ki chupp karaande
free period vich tappi jaande

ninth class wich pata nahi kehde singer da cassette liyanda
walkman da ik earphone apne kanna wich te ek mere kanna che lagaanda
mainu zara sa nahi jachna par tu mast hoke sunni jaanda
duffer, tennu khush vekh mera dil inj inj bhar aanda

tenth class vich doven ek duje naal boards di padhaai karde
tu mainu maths te science samjhaanda, assi ek din wi na lad de
achhe numberan ton tarde

eleventh vich saadi yaari paas vaale skool vich vi benchmark ban jaandi
tu har vele mere saath rehnda te meri saheliyaan mazaak udaandi
*eho jihi koi gal nahi, assi sirf dost hai ne* main sab nu samjhaandi
eh sun ke ek chandriye taan tere layi mainu hi chhithi phadaandi

tu ishqaan de chakkraan te painda, teri life goals pichhe reh jaandi
tera hi bhala soch ke, main oh chitthi seedhe dustbin te daal aandi
ehni sohni vi nahi si shehzaadi

assi dhai vajje bichhad de, te saade panj vajje phir milde
din diyan gallaan da khatta meetha achaar kad de
tu shaami khedhan jaanda te assi ghar bethe padh de
*tere liye chocolate laavanga je channo tu mera homework karde*

tution de raaste vich je koi mainu chhed jaanda
main ro ro dasdi tainu tu mainu chupp karaanda
chupchaap agle din tu ohnu cycle ton utaar giraanda
waapsi che anaardaana goliyan te GulzarSaab* di CD liyaanda

twelfth de preboard vich mere number zara kamm aande
aur tu te mere maa piyo .. mere pichhe pad jaande
apni padhaai chhad ke tussi mainu revisions karvaande
mere achhe numbraan layi tussi 'dwaare matha tek aande

farewell te tu mainu halka kaala teeka lagaaunda
khud kudiyan che ghumda, sab to nain ladaaunda
par mere paason ekko sohne munde nu wi door bhagaaunda
padhaai ton dhyaan nahi wandna, tu mainu samjhaaunda

eh vaakya khatam kidhar karaan main jaan sakdi hi nahi
saadi dosti inj nahi si, eh sirf kavita hai main manndi hi nahi
kade kade main sochdi haan te soch soch lagdi hi nahi
ke tu aur main hunne mile haan ..eh gal kuch jamdi hi nahi

assi doven ek skool che pade hunde
.. eh hasrat dilon tal di hi nah

December 26, 2011

ज़िन्दगी से शिकवा था ..


ज़िन्दगी से शिकवा था, ये तो अब समझ आया ..
मरे जा रहे थे जीने के नाम पे

जिस्म मिट्टी में दफ़न था पर धड़कता था रह रह कर ..
उधार की आहें थीं साँसों के नाम पे

रोज़ चाबी भरते थे, क्या क्या न कह मनाते थे ..
एक प्लास्टिक का खिलौना हो मानो, इस क़ल्ब* के नाम पे

बुलाते थे बादलों को आँखों में सिमट जाने को ..
आंसुओं में भीगते थे बारिशों के नाम पे

चाँद को लोरी सुना के सुला देते थे आसमान पे ..
करवटों से लड़ते थे .. नींदों के नाम पे

खुशफ़हमी थी की पा लिया सुकून खुदाई का ..
खुद को नाराज़ रखते थे हसरतों के नाम पे

[क़ल्ब* = दिल ]

December 7, 2011

ये जो है ज़िन्दगी ..



रात को इसे उतार के तकिये पे सुला देती हूँ प्यार से ..
रोज़ सुबह मुझसे पहले उठ जाती है ज़िन्दगी 

बस खिड़की से बाहर की दुनिया देखती है शहज़ादी ..
घर से  बाहर ले जाऊं तो डर जाती है ज़िन्दगी 

बहुत नाटक करती है ये ड्रामेबाज़ ..
कहना ज़रा भी तो नहीं मानती है ज़िन्दगी 

बहुत नादान है, किसी छोटी बच्ची की तरह ..
मेले की भीड़ में हाथ छोड़ जाती है जिंदगी 

बहुत ढूँढती हूँ इसे कह्कशों में ..
अकेले में रोती हुई गले लिपटने आती है ज़िन्दगी 

वो जो एक अपना हो उससे ही नाराज़ फिरती है जाने कहाँ ..
बेकार मेहमानों को घर बुला लाती है ज़िन्दगी 

मैं भी किसी उड़ान में रहती हूँ शायद ..
बारहां मेरी सोच से पीछे रह जाती है जिंदगी 

December 6, 2011

हर ख्याल जैसे एक इबादत हो ..




ख्याल भी अब मुझे धोका देने लगे है ...
जिन में तुम नहीं होते वो ख्याल ज़ेहन से खोने लगे हैं

पहले तो तुम किसी ख्याल में सिमट आते थे ..
अब ख्याल तुम्हारे सदके होने लगे हैं

एक वक़्त था सोच की उड़ान भरा करती थी ..
अब ख्यालों के पंछी तुम्हारे पिंजरे में सोने लगे हैं

तेरे ख्यालों को हम साँसों की माला बना कर ..
तेरी ज़िन्दगी में खुद को पिरोने लगे हैं

हर एक ख्याल तेरे नूर से रोशन हुआ है ..
हर ख्याल के कतरे में हम तेरे होने लगे हैं

एक नज़र जो तेरी इन ख्यालों पे पड़ जाए ऐ सनम ..
तेरे हिस्से के इज़हार अब अजनबियों से होने लगे हैं

ख्याल ख्याल संवर चूका है तेरे नाम से ..
ख्याल अब तेरी इबादत होने लगे हैं

December 1, 2011

वो एक पल में ..





चूम के गालों में पे रंग कई हज़ार दे गया ..
होठों को ये कैसा इंतज़ार दे गया

निगाहों से लिखे ख़त में अपना इज़हार दे गया ...
आँखों में मेरी, इश्क के आबशार दे गया

उसका पीछे मुड के देखना एक और इकरार दे गया ...
बेचैन कर के वो मुझे ये कैसा करार दे गया

मेरी झूठी कहानी ले गया अपने किस्से ओ आशार दे गया ...
बिन कसम बिन किसी वादे मुझे सदियों का ऐतबार दे गया

रफ्ता रफ्ता मेरी ज़िन्दगी चलती थी, वो एक पल में रफ़्तार दे गया
जोड़ के अपना नाम मेरे नाम से, ये कैसे रूहानी फ़रहात दे गया ...


November 30, 2011

तुम ही तो हो ..



कुछ भी कहती हूँ तुम्हे नया नहीं लगता
तुम्हे क्या कह के खुश किया करूँ
फिर लगता है की जब तुम मैं हो और मैं तुम
तो क्यूँ न खुद को ही खुश किया करूँ 

तुम मैं ही तो हो ..

कितने सवाल बन गयी थी मैं
हर कशमकश का आगाज़, मैं
किस बेतरतीबी से फैले थे 
मेरी कहानी के कागज़ कमरे में 

तुम ने यूँ सहेज दिया मुझे 
पास आ कर खुद में समेट लिया मुझे
मैं अपने विस्तार पे इतराने लगी थी 
"बस मेरी हो तुम" ...
कह कर संक्षेप दिया मुझे  

शक्ल से लगते तो नहीं पर थोड़े से पागल तुम भी हो 
मेरे हर दीवानेपन की हद में शामिल तुम भी हो 
मुझ में खो कर दुनिया से घाफ़िल तुम भी हो 
मैं अहमक सही ..
मेरी इस महफ़िल में अब दाखिल तुम भी हो 

अब तो जहाँ निगाह की बस्तियां जमती है तुम आ ठहरते हो 
मेरा श्वेत श्याम घर था, तुम हर रंग में आ संवरते हो 
महकती चांदनी के डेरों पे तुम आसमान सा आ बसरते हो 
घर की इन दर ओ दरवाजों के दरमियाँ बस तुम ही तो हो

अब मैं नहीं .. बस तुम ही तो हो ..

November 17, 2011

ये सड़क कहीं पहुँचती नहीं


ये गहरे काले पेड़ों के साये
अब नहीं डरती मैं इनसे
मेरे अन्दर की परछाई से
कम काले है
ये साये...

ये लम्बी सी सड़क
सड़क के इस तरफ एक भीड़
इस तरफ सैकड़ों तन्हाईयाँ
चलती ही जा रही है
ये सड़क कहीं पहुँचती नहीं

कार के शीशों पे ये
गिरता काला पानी
सामने की गाडी की तेज़ रौशनी
आँखें चौंधियां जाती है
पर मैं टस से मस नहीं होती

अब नहीं लगता हर आहट पे कोई है
एक आवेग लिए बस मैं चलती जा रही हूँ
मैं बस फिसलती ढलती
पानी में गलती जा रही हूँ ..

ये 'काश' नाम का शब्द खुद पर से
कब का मिटा दिया
बहुत रो चुकी
मैं अब हंसती जा रही हूँ
मैं दलदल में धंसती जा रही हूँ ..

हर चौराहे पे सामान दफनाती जा रही हूँ
मैं खुद को तरसता देख मुस्कुराती जा रही हूँ ..

इस अँधेरी गलियों में खुद को गुमाती जा रही हूँ
खुद से ही नाराज़ हूँ खुद को ही मनाती जा रही हूँ ..

हर दर्द को आँखों से बहाती जा रही हूँ
मैं वक़्त के झुनझुने से खुद को बहलाती जा रही हूँ ..

मैं अपनी हर जीत से हारती जा रही हूँ
मैं ये जिंदगी खुद पर से उतारती जा रही हूँ ..

October 29, 2011

बात कुछ भी नहीं पर ...



बात कुछ भी नहीं पर अब बात नहीं होती ... 
रोज़ मिलते है पर मुलाक़ात नहीं होती

इधर उधर के शब्द होते है पर वो बात नहीं होती ...
तारीखें निकलती है पर दिन से रात नहीं होती 

ये बादल जो बिन पानी लिए तैरते है आसमान में ..
हमें तब भी भीगा जाते है जब बरसात नहीं होती

तन्हा रह गया वो समंदर का मोती ...
आस पास पानी है पर अब प्यास नहीं होती

मुझे देख के चाँद तारे भी चुप रहते है ...
इनसे मेरी कोई बात राज़ नहीं होती 

कुछ कहानियाँ जल के ख़तम हो जाती है ...
कुछ कहानियों की शुरुआत नहीं होती 

October 27, 2011

शब्दों की डांट




आज शब्द फिर मुझ पे झल्लाने लगे हैं
क्या फिर से वही लिखने को कहोगी 
वो पुरानी बात जिसके सर न पैर 
कुछ बेकार सा नाम दे कर रहोगी 

सिर्फ एक शाम का बहाना था 
रात तक उसे सिमट जाना था
तुम हर शाम उस शाम को समेटती आ रही हो
उस शाम का ढलना कब तक टालती रहोगी

कुछ भी तो नहीं कहा उसने 
हमने कितना ज़ोर दिया ज़रा पूछो हमसे 
दोनों चुपचाप चलते रहे कितनी देर 
उन क़दमों को कब तक सफ़र में संभालती रहोगी

उफ़, मुस्कुराना तो सब जानते है
लोग तो आजकल बेवजह भी मुस्कुराते है 
उसके खुश इख्लाक को इश्क समझ के
कब तक खवाबों के घोंसले बनाती रहोगी 

हमें माफ़ करो
हमसे ये अनकही बातें नहीं समझी जाती
ये आँखों के इज़हार ये बे जुबां इकरार 
हम नबीना हैं कब तक हम से मदद मांगती रहोगी 

उसका रास्ता यूँ निहारती रहोगी  
उस सांवरे के ख्वाब संवारती रहोगी
हम थक गयीं तुम्हे समझाते समझाते 
तुम कब तक उसे अपना मानती रहोगी

October 19, 2011

एक ठंडी आग


एक ठंडी आग की तरह स्याही बिखेरती थी उसकी कलम 
कागज़ बर्फ सा सिकुड़ जाता पर शब्द देर तक जलते रहे

ये कैसे अफ़साने थे आँखों में मौजूद 
आग के शोले भी पानी की तरह पलते रहे 

वो ठंडा चाँद इस ज़मीन से कोसों दूर  
उम्र भर उसकी चाहत में धीरे धीरे पिघलते रहे

क्या सच में जिस्म से जान जुदा कर देती है आग
एक सर्द सी रात में इस ख्याल से उलझते रहे

आखिरी चिंगारी



ये राख के ढेर पे जो आखिरी चिंगारी बाकी है
मेरी बस इतनी सी ही पहचान बाकी है

लफ्ज़ झुलस गए, धुंए में दिखती नहीं ख्वाइश 

इस राख में अब तलक मेरे आबशार बाकी है

दाग नहीं जलते दाग साथ निभाते है 
दिल दुखाने को यादों के ये जालसाज़ बाकी है

बाज़ नहीं आती अपनी साज़िश से ये रात की महफ़िल 
मेरी खिड़की में जलता हुआ रात का आफ़ताब बाकी है

मेरे बाद भी पहुँच जायेंगी मेरी दुआएं तुम तक 
इस राख में अब भी मेरी मोहब्बत की क़ायनात बाकी है

September 20, 2011

बिटिया आज मायके आई हुई है



बिटिया आज मायके आई हुई है
कितना कुछ बदल गया माँ का घर वही पुराना
पर मेरा अपना ..
या नहीं .. पता नहीं

मेरी सारी किताबें वही अलमारी में सजी है
और धुल भी नहीं जमी
एक खिलौना बिस्तर पे औंधा पड़ा है
चादर पे एक भी सिलवट नहीं

एक फोटो में मेरी दोस्त मुस्कुरा रही है
एक फोटो में बहना गले लगा रही है
वो पल वो शरारतें
मुझे कुछ भी तो भूला नहीं है

ये कम्बल मुझे एक बार पापा ने ओढाया था
उसी रात जब गुस्से में मैंने उनको बहुत सताया था
... और खाना भी नहीं खाया था

इसी तकिये पे मैंने कितने आंसू गिराए थे
देश लौटने के उलटे सीधे
कितने प्लान्स बनाये थे

इस बक्से में चूड़ियाँ सहमी पड़ी मिली
शायद इनको एक बार उतार फेंका था
पर मुझे देख ये भी खिलखिला उठी हैं

ये मेज़ .. यहाँ मैं पढने का नाटक किया करती थी
ये मेज़ .. यहाँ में अपने सपनो से लड़ा करती थी

ये दरवाज़े के पीछे कपडे टांगने की कील
इस पे रोज़ के अपने तज़रबे तांगा करती थी

इस खिड़की पे चाँद आज भी मेरा इंतज़ार कर रहा था

तुम ज़रा रुकना मैं अभी आई
.. शायद इससे भी कहा था

ये बिस्तर इसपे नींद आते आते चली जाती थी
अगले दिन पेपर होता था और मैं तारों से बतियाती थी
... पर पास हो जाती थी

कितनी हिदायतें इस कमरे में आज भी गूंजती हैं
हम याद आयीं कभी ?
... यह भी पूछतीं हैं

बिटिया खुश बहुत है पर फिर भी सोचती है
क्यूँ जाना ज़रूरी था ये खुद से ही पूछती है

एक किताब की तरह में भी अलमारी में छुप जाती
या चूड़ियों के डिब्बे में बिंदिया बन के गुम जाती

कमरे की हर चीज़ मुझे यूँ हैरानी से देखती है
पता नहीं फिर कब आओगी .. ताना फेंकती है

दीवार पे टंगी घडी बेवजह मुस्कुराती है
वक़्त के अलावा सब थम गया है
वक़्त की बराबरी बिटिया कहाँ कर पाती है 

September 14, 2011

हिंदी का महत्व

मैं कैसी कवयित्री हूँ ..
नहीं जानती थी कि आज हिन्दी दिवस है
नहीं जानती थी कि आज हिन्दी हिन्दी खेलना है

क्या हिन्दी को एक दिन में मनाया जा सकेगा

मैं कैसे मनाऊं ये दिवस
आज हिन्दी साहित्य के नाम का केक काट लूं या
हिन्दी कविताओं का गुलदस्ता बना मेज़ पे सजा लूं

और कहाँ मनाऊं ये दिवस
परदेस में कौन सुनेगा मेरा हिन्दी प्रेम
और दिल्ली अभी भी दूर है दोस्तों

पर मैं क्यूँ मनाऊं ये दिवस
क्यूँ दूँ श्रद्धांजलि उस भाषा को
जो अमर है मुझमें
कितने ही अनुभव लिए

अब अपनी मातृभाषा से प्रेम करना कैसे सीखूं

बचपन की हर याद में हिन्दी है
चाचा चौधरी का मज़ा आर्चिज़ कॉमिक्स में कहाँ मिल पाया
हिंदी न हो तो शिवानी जिज्जी को कैसे याद करूँ
कैसे प्रेमचंद की 'निर्मला' को अंग्रेजी में अनुवाद करूँ

पापा की हर डांट हिन्दी में थी
वैसे दादी पंजाबी है पर वो भी गुस्से में हिन्दी ही बोलती थी
लेकिन माँ ने पुचकार लिया ...
"बिटिया" कह के मना लिया

हिंदी के कितने ही निबंध लिखवाए मुझसे मेरी छोटी बहना ने
हिंदी की थी भाई की वो पहली गाली जिसपे उसे मार पड़ी
पापा परदेस जाने लगे तो उनके बैग में छुपाया एक पत्र
गुडिया चाहे न लाना ... पापा जल्दी आ जाना
हाँ .. हिंदी में 

हिंदी प्रेम इसलिए नहीं क्योंकि पढ़नी चाहिए
हिंदी प्रेम इसलिए क्यूँकि .. ये अपनी है

यूँ तो अंग्रेजी में बहुत गिटपिट आती है मुझे
पर अपनी भावनाओं को हिन्दी में ही व्यक्त कर पाती हूँ मैं
क्यूँकि इसी में बह पाती हूँ मैं

और सुन लो सब.. डर नहीं है मुझे
हिन्दी के जैसे ही मुझमें भी मिलावट है
थोड़ी उर्दू, बंगला, पंजाबी भी है
क्यूँ करूँ मैं भाषा का सम्बन्ध विच्छेद

हिन्दी में कितनी भाषाओं का समावेश है
राष्ट्रीय भाषा है .. धर्मंनिरपेक्ष भाषा है
हिन्दी गवर्नमेंट स्कूल की भाषा नहीं
मेरी भाषा है .. हम सबकी भाषा है

माँ कहती है मेरा पहला शब्द हिन्दी में था
माँ ...
मेरा अंतिम शब्द मैं कहती हूँ
... साईं

September 3, 2011

तुझे अलविदा कह आई


तेरी याद वक़्त के पालने में छोड़ आई
मैं कितनी आसानी से तुझे अलविदा कह आई

तुझे अपना घर अपना आशियाना बनाना चाहती थी मगर
ये दीवार ओ दर अपने हाथों से तोड़ आई

एक अदना सी चीज़ तेरी चुरा लायी
तेरे आँखों के नूर अपने माथे पे सजा लायी

किस तरह मिटाया तुझे खुद पर से ये बताऊँ कैसे
छोड़ दिया मिटटी पर से अपना हक .. तेरी रूह मगर लिपट आई

शायद ये झूठ हो की तेरी याद से नाता तोड़ लिया
शायद ये सच हो की तुझे साँसों में समेट लायी

सावन के झूले पे वो बरसात भूल आई
पर हाथों में तेरे लिए लिख के एक दुआ .. मैं कबूल आई

तुझे अलविदा कह आई ...