December 1, 2011

वो एक पल में ..





चूम के गालों में पे रंग कई हज़ार दे गया ..
होठों को ये कैसा इंतज़ार दे गया

निगाहों से लिखे ख़त में अपना इज़हार दे गया ...
आँखों में मेरी, इश्क के आबशार दे गया

उसका पीछे मुड के देखना एक और इकरार दे गया ...
बेचैन कर के वो मुझे ये कैसा करार दे गया

मेरी झूठी कहानी ले गया अपने किस्से ओ आशार दे गया ...
बिन कसम बिन किसी वादे मुझे सदियों का ऐतबार दे गया

रफ्ता रफ्ता मेरी ज़िन्दगी चलती थी, वो एक पल में रफ़्तार दे गया
जोड़ के अपना नाम मेरे नाम से, ये कैसे रूहानी फ़रहात दे गया ...


3 comments:

Sunil Kumar said...

रफ्ता रफ्ता मेरी ज़िन्दगी चलती थी, वो एक पल में रफ़्तार दे गया
जोड़ के अपना नाम मेरे नाम से, ये कैसे रूहानी फ़रहात दे गया ...
गजब का शेर , मुबारक हो

CB said...

khoobsurat

संजय भास्कर said...

एक एक शेर को खूबसूरती से तराशा है आपने, पढ़ कर मज़ा आ गया!