April 20, 2016

आधे यहाँ रखे हैं..


आधे यहाँ रखे हैं, आधे वहाँ रखे हैं..
ये ख़याल तुम्हारे जाने कहाँ कहाँ रखे हैं ..

कुछ ख़र्च हो गए कुछ ख़त्म होते रहे ..
बाक़ी के सब क़िस्से हमने बेजुबाँ रखे हैं ..

महफ़िलें सजी है जिन घुँघरुओं के लिए..
हमने कब के वो दीवारों में चुनवा रखे हैं..

आते हैं, बैठे बिना मगर चले जाते हैं..
फ़िज़ूल ही दिल ने मकान बनवा रखे हैं..

यूँ करें कि नदियाँ मोड़ लाएँ अपनी ..
कि समंदरों ने दाम बढ़ा रखे हैं ..


वो वादा करने से पहले तोल-भाव करते हैं..
हम ने बेवजह ही सैंकड़ों गुमान रखे हैं..

इन हर्फों में उनकी महक नहीं है कहीं ..
किताबों में फूल किसी ने खामखां रखे हैं..

सालों से चाँद ने रुलाया है मगर ..
वक़्त की धूप ने आँसू सुखा रखे हैं..


(Photo Credit: Unfortunately I do not know the source of this beautiful picture. I found it on net as it was closest to emotion in my poem.)

4 comments:

rita puri said...

As always...beautiful words..

rita puri said...

As always...beautiful words..

Dayanand Arya said...

" आते हैं, बैठे बिना मगर चले जाते हैं..
फ़िज़ूल ही दिल ने मकान बनवा रखे हैं..

यूँ करें कि नदियाँ मोड़ लाएँ अपनी ..
कि समंदरों ने दाम बढ़ा रखे हैं .."
ये दो पंक्तियाँ तो लाजवाब हैं

Shikha saxena said...

बहुत खूबसूरत