October 19, 2011

आखिरी चिंगारी



ये राख के ढेर पे जो आखिरी चिंगारी बाकी है
मेरी बस इतनी सी ही पहचान बाकी है

लफ्ज़ झुलस गए, धुंए में दिखती नहीं ख्वाइश 

इस राख में अब तलक मेरे आबशार बाकी है

दाग नहीं जलते दाग साथ निभाते है 
दिल दुखाने को यादों के ये जालसाज़ बाकी है

बाज़ नहीं आती अपनी साज़िश से ये रात की महफ़िल 
मेरी खिड़की में जलता हुआ रात का आफ़ताब बाकी है

मेरे बाद भी पहुँच जायेंगी मेरी दुआएं तुम तक 
इस राख में अब भी मेरी मोहब्बत की क़ायनात बाकी है

2 comments:

CB said...

jhalak hai ye SKB ki jadugari ki,
dekho aage kya kya chamatkar abhi baki hain.


awsm :)

Gurnam Singh Sodhi said...

your level going up and up day by day... wow :)