October 29, 2011

बात कुछ भी नहीं पर ...



बात कुछ भी नहीं पर अब बात नहीं होती ... 
रोज़ मिलते है पर मुलाक़ात नहीं होती

इधर उधर के शब्द होते है पर वो बात नहीं होती ...
तारीखें निकलती है पर दिन से रात नहीं होती 

ये बादल जो बिन पानी लिए तैरते है आसमान में ..
हमें तब भी भीगा जाते है जब बरसात नहीं होती

तन्हा रह गया वो समंदर का मोती ...
आस पास पानी है पर अब प्यास नहीं होती

मुझे देख के चाँद तारे भी चुप रहते है ...
इनसे मेरी कोई बात राज़ नहीं होती 

कुछ कहानियाँ जल के ख़तम हो जाती है ...
कुछ कहानियों की शुरुआत नहीं होती 

11 comments:

Ankur Srivastava said...

बहुत ही कशिश है आपकी कविताओ में ! एक अजीब से खलिश ....पता नहीं क्या !


~आप का प्रिय पाठक~

Misha said...

OMG..
Such complicated emotions.. yet so simple words...
Straight from heart!
Beautiful. :)

Aadii said...

Awesome!!

तन्हा रह गया वो समंदर का मोती ...
आस पास पानी है पर अब प्यास नहीं होती

कुछ कहानियाँ जल के ख़तम हो जाती है ...
कुछ कहानियों की शुरुआत नहीं होती

Loved it.

Sunil Kumar said...

कुछ कहानियाँ जल के ख़तम हो जाती है ...
कुछ कहानियों की शुरुआत नहीं होती
वही कहानियां कहलाती हैं जो हमेशा अमर रहती हैं

प्रतीक माहेश्वरी said...

आजकल के संकीर्ण रिश्तों को बखूबी जताती आपकी पंक्तियाँ..
खूबसूरत..

Anonymous said...

beautiful :)

Deepak | Money Making Boy said...

Atti Khubsurat. Maza Aagaya.

CB said...

बात कुछ भी नहीं पर अब बात नहीं होती ...
रोज़ मिलते है पर मुलाक़ात नहीं होती

rocking

CB said...

बात कुछ भी नहीं पर अब बात नहीं होती ...
रोज़ मिलते है पर मुलाक़ात नहीं होती

rocking

Shahid Ansari said...

bahut khoob..:)

संजय भास्कर said...

तन्हा रह गया वो समंदर का मोती ...
आस पास पानी है पर अब प्यास नहीं होती
........बहुत सही बात कही