August 1, 2011

एक और ख़त जो भेजा नहीं ...

कुछ रोज़ पहले एक ख़त लिखा था पर छुपा लिया था आँखों में /
आज उसे पढ़ के एक फीकी सी मुस्कराहट आई है

उस ख़त में चाँद से शिकायत की तुम को भी ले आया करें /
मेरी शिकायत चाँद तक शायद नहीं पहुँच पायी है

एक बादल की बारिश तब लिखी थी तुमको /
एक बारिश आज फिर आँखों में भर आई है

आईने का एक मुस्कुराता चेहरा शायद तुम्हे बुला भी लाता /
क्या भेजती की आईने ने उदास सी शकल बनायीं है

कितनी बार नाराज़ हुई तुमसे, कितनी बार दिल को समझाया है /
इस बार तुम समझा दो इसे, मेरा तो ये बन बैठा सौदाई है

हर बार सोचती हूँ तुम आओगे तो अब तुमसे नहीं बोलूंगी /
मासूमियत देखो, तुम नहीं हो फिर भी दिल की बात तुमहे ही बताई है

3 comments:

रश्मि प्रभा... said...

waah....

संजय भास्कर said...

एक-एक शब्द भावपूर्ण .....बहुत सुन्दर

Misha said...

some feelings... which i think only a girl can feel..
loved it!
keep writing, reading your poetry is such a treat. :))