August 7, 2011

आज मांगती हूँ ...


मेरे पास खुद की कोई ख्वाइश ही नहीं है ऐ दोस्त /
इसीलिए दूसरों की ख्वाइश अपना के दुआ मांगती हूँ

दुनिया में इतने गरीब देखे तो सोच में पड़ गयी /
किस्मतों को कैसे बांटा है उसने .. जवाब मांगती हूँ

एक एक चम्मच सबको खिलाना है मुझे /
ज़िन्दगी को जीतने का हौसला बेहिसाब मांगती हूँ

मैंने दे सकूँ सबको एक मुट्ठी भर आसमान /
जो पूरे होते हो वो ख्वाब मांगती हूँ

रंग बिरंगी से जी उचट गया हो मानो /
अब बस अमन और आमना का सफ़ेद गुलाब मांगती हूँ

1 comment:

s.H.a.S.h.I said...

Nice poetry .. really wonderful poems..