August 6, 2011

एक वसीयत ...



मैंने बादल भेजती हूँ तुम बारिश में भीग लेना /
मैं काजल भेजती हूँ तुम आँखों में खींच लेना

मेरा दर्द बेपर्दा नज़र आये तो आँखें मीच लेना /
एक एहसास के समंदर को आसुओं से सींच लेना

कुछ सपनो की सौगातें है, मुठी में भींच लेना /
मैं मरना भेजती हूँ तुम जीना सीख लेना

मेरे हिस्से का कभी सवाल आये तो झूठी सी तकदीर कहना /
भूल जाना मेरा नाम बस 'ख़्वाबों की हीर' कहना

1 comment:

संजय भास्कर said...

bahut sundar kavy srijan ,,,,, shukriya ji